Monday, September 28, 2015

तेरे शहर में


" बहुत दिन हो गये थे मैं उस शहर मै पओ रखे तोह सोचा कि एकबार घुम आये. पता नही लेकिन इतने सालो में कुछ कम हुई ज़रुर मोहब्ब्त हमरी लेकिन ईश्क तो आख़िर ईतना समझदर कहा थोड़ा लपर्वाह हैं. इस शहर में कुछ तो बात थी की हमारे प्यार को परवान चडा दिया. उनसे मिलने कि कही गुंज़ाइश नहीं थी लेकिन हसरत और आशंका दोनों ही थी. पाव जैसे दौर रहे थे लेकिन आंखे देखने कि हीम्मत नहीं करती."

बरे चर्चे थे उनके उन दिनों सुना था की कई लोगो का दिल था उनके पास. जब ये पता चला की शायद वो उसे ताकते हैं तो शर्म कम और एक अजीब घमंड जैसे सर चढ़ गया. पर यह घमंड उडंद अल्हर ना होके एक शांत आभा छोड जती जो उसे एक रहस्य में घेर लेते और हमारे काहनी के नायक को अपनी ओर खिचते. सादगी भी कोई वस्तु हैं और ये हमारी नाइका में देव्तव था.

किस्से बने काहानिया लिखी गई शहर के रस्तो में चर्चे हुए. फिर भग्दर मची और कहनी कही धुल में दब गई. गाव होता तो कहनी की धुल उस पिपल की छाव में कही छुप्के श्रींगार करते और हमारे नायक और नईका की प्रतिक्शा करते. लेकिन शहर के दौर भाग में लोगो के पाव चलते हैं तेज़ और कितनी ही किस्से रौंधे जाते हैं. 

खैर उस दिन बरा सितम हुआ इस किस्से पर एक और परत लगी. वो ज़ुल्फो के आर से देखकर थोड़ी चौकी लेकिन फिर इस उम्मीद से ही तो आई थी वो की एक बार देख ले उसे. एक बार वो अधुरी हँसी पुरी कर ले. पिछले बार घबराके घुस्से से ताका था तो साइकल से गिर गये थे आज हंस दिया तो शायद कब्र से निकल खरे हो. आख़िर चलीस साल पुरानी अधुरी मोहब्बत की कुछ तो किमत होती हैं.

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