Monday, September 28, 2015

तेरे शहर में


" बहुत दिन हो गये थे मैं उस शहर मै पओ रखे तोह सोचा कि एकबार घुम आये. पता नही लेकिन इतने सालो में कुछ कम हुई ज़रुर मोहब्ब्त हमरी लेकिन ईश्क तो आख़िर ईतना समझदर कहा थोड़ा लपर्वाह हैं. इस शहर में कुछ तो बात थी की हमारे प्यार को परवान चडा दिया. उनसे मिलने कि कही गुंज़ाइश नहीं थी लेकिन हसरत और आशंका दोनों ही थी. पाव जैसे दौर रहे थे लेकिन आंखे देखने कि हीम्मत नहीं करती."